मेघालय की राजधानी शिलांग से 60 किमी की दूरी पर बसे कॉन्गथॉन्ग नामक गांव बहुत खूबसूरत है। यह गांव मेघालय के जंगलों और पहाड़ों के बीच बसा हुआ है। इस गांव में खासी जनजाति के लोग रहते हैं। खासी एक मातृप्रधान समाज है। इसलिए यहां लोगों के नाम उस महिला को समर्पित होते हैं, जिसने कबीले की शुरुआत की हो या कबीले की महिला पूर्वज हो।
यह प्रथा पूर्वी खासी पहाड़ो के करीब 12 गांवों में आज भी जारी है, जिसे ‘खादर शनोंग’ इलाका कहा जाता है। बदकिस्मती से इनकी यह परंपरा इतिहास के किसी पन्ने पर दर्ज नहीं है। वे भी यह नहीं जानते कि उनके यहां यह परंपरा कब शुरू हुई, लेकिन यह पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।
कॉन्गथॉन्ग गांव के लोगों के दो नाम होते हैं, पहला साधारण नाम और दूसरा म्यूजिकल नाम। म्यूजिकल नाम भी दो तरह के होते हैं, पहला छोटी धुन में और दूसरा बड़ी धुन में। छोटी धुन वाले नाम घरों में पुकारे जाते हैं, जबकि बड़ी धुन के नामों को जंगल में पुकारने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यहां के लोगों का मानना है कि बड़ी धुन के नाम बुरी आत्माओं से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
हालांकि, अब गांवों में इंटरनेट और मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जिसके कारण जिंग्रवाई याऊबे परंपरा की खुशबू खो रही है। बाहर के बॉलीवुड और हॉलीवुड के म्यूजिक से यहां के लोग प्रभावित हो रहे हैं। एक महिला ने तो अपने बच्चे का नाम बॉलीवुड गाने ‘कहो न प्यार है’ कि धुन पर रखा है। अब तो स्थानीय लोग गांव से बाहर भी जा रहे हैं और उन गांवों में शादी भी कर रहे हैं, जहां जिंग्रवाई याऊबे को नहीं अपनाया जाता। अब यहां कम ही लोग मिलते हैं, जिनका नाम म्यूजिकल हो।
इस अनोखी परंपरा जिंग्रवाई याऊबे पर मणिपुर के नेशनल अवॉर्ड विनिंग, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर ओइनाम डोरेन एक फिल्म, माई नेम इज ई ई ओ ओ ओ बना चुके हैं। इस फिल्म को सांस्कृतिक सांसाधन और प्रशिक्षण केंद्र ने प्रोड्यूस किया था। चूंकि डोरेन मणिपुर से हैं, तो उनके लिए मेघालय की खासी भाषा को समझना मुश्किल था। यह फिल्म लंदन और इटली में अवॉर्ड जीत चुकी है।


